... आज खामोश हूँ ...
न कुछ कहने को,
न कुछ सुनने को,
न कुछ बोलने को,
न कुछ लिखने को.
... आज खामोश हूँ ...
न कोई गम है,
न को ख़ुशी है ,
न को दर्द है,
न ही कोई उमंग है .
... आज सिर्फ खामोश हूँ ...
Saturday, December 18, 2010
Friday, December 10, 2010
आज जीना चाहता हूँ
इन जंजीरों से अलग होना चाहता हूँ
इस अंधी दौड़ से अलग होना चाहता हूँ
खुद को खुद से जोड़ना चाहता हूँ..
आज जीना चाहता हूँ
खुली हवा में सांस लेना चाहता हूँ
ठंडी लहरों में बहना चाहता हूँ
पेड़ों की तरह डोलना चाहता हूँ ..
आज जीना चाहता हूँ
नंगे पों घंस पे दौड़ना चाहता हूँ
अपने हाथों से कोमल कलियाँ छूना चाहता हूँ
कीचड़ में खिले कमल को पाना चाहता हूँ ..
आज जीना चाहता हूँ
सपनों में खोना चाहता हूँ
आँखें बंद कर दौड़ना चाहता हूँ
आज बंधनों को तोडना चाहता हूँ ...
...आज जीना चाहता हूँ ...
इन जंजीरों से अलग होना चाहता हूँ
इस अंधी दौड़ से अलग होना चाहता हूँ
खुद को खुद से जोड़ना चाहता हूँ..
आज जीना चाहता हूँ
खुली हवा में सांस लेना चाहता हूँ
ठंडी लहरों में बहना चाहता हूँ
पेड़ों की तरह डोलना चाहता हूँ ..
आज जीना चाहता हूँ
नंगे पों घंस पे दौड़ना चाहता हूँ
अपने हाथों से कोमल कलियाँ छूना चाहता हूँ
कीचड़ में खिले कमल को पाना चाहता हूँ ..
आज जीना चाहता हूँ
सपनों में खोना चाहता हूँ
आँखें बंद कर दौड़ना चाहता हूँ
आज बंधनों को तोडना चाहता हूँ ...
...आज जीना चाहता हूँ ...
Tuesday, November 30, 2010
इस अंधी दौड़ में
इतनी तेज़ भागे की
याद नही कहाँ उतारे थे जूते ..
सपनो को अपना बनाने के फेर में
अपनों से इतने दूर चले आये की
याद नही कहाँ उतारे थे जूते..
अपना सर ऊँचा रखने क लिए
कितनो का सर कलम किया
किसी को अपना बनाने क लिए
कितनो को खुद से दूर किया
तितलियों को पकड़ने में
फूलों से इतने दूर चले आये की
याद नही कहाँ उतारे थे जूते..
दूसरों को खुश करने क लिए
खुद से इतने दूर चले आये की
याद नही कहाँ उतारे थे जूते..
इतनी तेज़ भागे की
याद नही कहाँ उतारे थे जूते ..
सपनो को अपना बनाने के फेर में
अपनों से इतने दूर चले आये की
याद नही कहाँ उतारे थे जूते..
अपना सर ऊँचा रखने क लिए
कितनो का सर कलम किया
किसी को अपना बनाने क लिए
कितनो को खुद से दूर किया
तितलियों को पकड़ने में
फूलों से इतने दूर चले आये की
याद नही कहाँ उतारे थे जूते..
दूसरों को खुश करने क लिए
खुद से इतने दूर चले आये की
याद नही कहाँ उतारे थे जूते..
Sunday, November 28, 2010
चुपचाप गुमसुम रहने लगा हूँ,
भीड़ में नहीं ,तन्हाई में जीने लगा हूँ,
रौशनी नहीं ,अँधेरे में रहने लगा हूँ ,
ख़ुशी नहीं ,दर्द को जले लगाने लगा हूँ,
जीत नहीं ,हार की भीख मांगने लगा हूँ,
खूबियाँ नहीं ,कमियाँ गिनने लगा हूँ,
लोगों नहीं,परछाई से डरने लगा हूँ ,
खुली हवा छोड़ ,घुटन में जिनने लगा हूँ ,
खुद से ही खुद का अंत करने लगा हूँ ...
भीड़ में नहीं ,तन्हाई में जीने लगा हूँ,
रौशनी नहीं ,अँधेरे में रहने लगा हूँ ,
ख़ुशी नहीं ,दर्द को जले लगाने लगा हूँ,
जीत नहीं ,हार की भीख मांगने लगा हूँ,
खूबियाँ नहीं ,कमियाँ गिनने लगा हूँ,
लोगों नहीं,परछाई से डरने लगा हूँ ,
खुली हवा छोड़ ,घुटन में जिनने लगा हूँ ,
खुद से ही खुद का अंत करने लगा हूँ ...
Friday, November 19, 2010
Friday, November 5, 2010
याद आती है,
माँ की झलक के लिए मोटे-मोटे आंसूं बहाना,
पिताजी की मेहनती उँगलियों को थामे चलना,
मेले में खिलोने के लिए माँ के आँचल को खींचना ,
पिताजी की चूमती प्यारी मुछों से खेलना ..
याद आती है,
स्कूल के पहले दिन का वो रोना,
माँ को बार-बार पलट-पलट कर देखना,
बगल में बैठने वाले को भीगी आँखों से घूरना,
और घंटी बजने का इंतज़ार करना..
याद आती है ,
बारिश के मौसम में कागज की कश्ती का वो डोलना,
उन उछलते मेंढकों को तंग करना,
माँ की डांट से डरते हुए बारिश में भींगना,
भींग कर बीमार होने पर पिताजी का डांटना..
याद आती है,
वो पहली दाढ़ी को बार-बार निहारना,
वो माँ-पिताजी से पहली बार उलझना,
उदास होने पर माँ का वो समझना ,
डरते हुए पिताजी से माफ़ी माँगना..
याद आती है ,
क्लास में बगलवाली लड़की का हँसना,
बात करने के नए-नए मौके तलाशना,
उसकी मदद के लिए दौड़े चले आना,
दुसरे लड़के से बात करते देख वो जलना..
याद आती है ,
दोस्तों के साथ सीढियों पे मस्ती करना ,
एक के तिफ्फिन को बीस के साथ खाना,
एक-दुसरे को अजीब-अजीब नामों से बुलाना,
पकडे जाने पर क्लास के बाहर खड़े रहना ..
याद आती है,
एक दुसरे के लिए लड़ने को तैयार रहना ,
क्लास के पिछले दरवाज़े से भागना ,
स्कूल की ऊँची दीवार को फांदना,
पार्क में जाकर हरी घांस पर घंटों लेटे रहना..
याद आती है इन्ही पलों की,
जब अकेले में धुंए का कश लेता हूँ,
जब कमरे में लेटे हुए नींद का इंतज़ार करता हूँ,
जब सुनसान राहों पर अकेले चलता हूँ,
जब खुद को तन्हा पाता हूँ.....
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