माँ की झलक के लिए मोटे-मोटे आंसूं बहाना,
पिताजी की मेहनती उँगलियों को थामे चलना,
मेले में खिलोने के लिए माँ के आँचल को खींचना ,
पिताजी की चूमती प्यारी मुछों से खेलना ..
याद आती है,
स्कूल के पहले दिन का वो रोना,
माँ को बार-बार पलट-पलट कर देखना,
बगल में बैठने वाले को भीगी आँखों से घूरना,
और घंटी बजने का इंतज़ार करना..
याद आती है ,
बारिश के मौसम में कागज की कश्ती का वो डोलना,
उन उछलते मेंढकों को तंग करना,
माँ की डांट से डरते हुए बारिश में भींगना,
भींग कर बीमार होने पर पिताजी का डांटना..
याद आती है,
वो पहली दाढ़ी को बार-बार निहारना,
वो माँ-पिताजी से पहली बार उलझना,
उदास होने पर माँ का वो समझना ,
डरते हुए पिताजी से माफ़ी माँगना..
याद आती है ,
क्लास में बगलवाली लड़की का हँसना,
बात करने के नए-नए मौके तलाशना,
उसकी मदद के लिए दौड़े चले आना,
दुसरे लड़के से बात करते देख वो जलना..
याद आती है ,
दोस्तों के साथ सीढियों पे मस्ती करना ,
एक के तिफ्फिन को बीस के साथ खाना,
एक-दुसरे को अजीब-अजीब नामों से बुलाना,
पकडे जाने पर क्लास के बाहर खड़े रहना ..
याद आती है,
एक दुसरे के लिए लड़ने को तैयार रहना ,
क्लास के पिछले दरवाज़े से भागना ,
स्कूल की ऊँची दीवार को फांदना,
पार्क में जाकर हरी घांस पर घंटों लेटे रहना..
याद आती है इन्ही पलों की,
जब अकेले में धुंए का कश लेता हूँ,
जब कमरे में लेटे हुए नींद का इंतज़ार करता हूँ,
जब सुनसान राहों पर अकेले चलता हूँ,
जब खुद को तन्हा पाता हूँ.....
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