Sunday, October 16, 2011

डर लगता है ,
परछाइयों से
पास आती हर एक आहट  से |

डर लगता है ,
अँधेरे रास्तों से
उनके साथ होती ख़ामोशी से |

डर लगता है ,
ऊँचाइयों को छूने से
वहां पहुँच कर गिरने से |

डर लगता है ,
ख्वाहिशें पालने से
पूरे  न होने के दर्द से |

डर लगता है,
उम्मीद भरी नज़रों से 
खरा न उतर पाने की ग्लानी से |

डर लगता है,
आगे बढ़ते जाने से
भविष्य क गर्भ में
पल रही अनहोनी से ||

Thursday, July 21, 2011

क्यों सब पूरा हो के भी 
 कुछ अधुरा सा है 
सब कुछ कह के भी 
कुछ अनसुना सा है |


सपने पाले बैठे थे 
सारा जहाँ अपना होगा
हमसे ज़माना होगा 
ज़माने से हम नहीं |

दुनिया हमारी मुट्ठी  में 
खुशियाँ  हमारे क़दमों पे 
 हम यहाँ के बादशाह
 और सारी नज़रें हम पे |

 न जाने कैसे सपनों को 
किसकी नज़र लग गयी 
 समय की तेज़ रफ़्तार में 
किस्मत हमसे रूठ गयी |

चाहा तो बहुत कुछ  था
पर चाहने से क्या होता है 
अपनी ही गलतियों से
अपनी किस्मत फूटी थी |

ज़माने को क्या पता
हम पे क्या बीतती है ...

फर्क बस इतना है ,
अपना गम भुलाने के लिए 
वो हमपे हँस रहे हैं 
और एक हम हैं 
अपने आंसुओं को छोड़ 
दूसरों के आंसूं पोंछ रहे हैं ||

Thursday, July 7, 2011

आज लौटना चाहता हूँ
उन पलों में ,

जहाँ हर एक सुबह
माँ की गोद में होती थी 
डब डब करती आँखों को
पहली दर्शन माँ की होती थी |

आज लौटना चाहता हूँ
उन पलों में,

जहाँ पापा के गाड़ी की
कर्कश होर्न भी
सबसे प्यारी लगती थी |

आज लौटना चाहता हूँ
उन पलों में ,

जहाँ लड़खड़ाने पे भी
पापा का सहारा होता था
अँधेरी रातों के डर से
छुपने क लिए माँ का अंचल काफी होता था |

आज लौटना चाहता हूँ
उन पलों में,

जहाँ एक कहानी
या एक लडू ही
अपनी मांगे होती थी |

आज लौटना चाहता हूँ
उन पलों में
जिनकी कीमत आज
समझ पता हूँ ||

Wednesday, July 6, 2011

न जाने क्यों
जिंदगी थम सी गयी है
निराशा के जंगल में कहीं
खो सी गयी है |

न जाने क्यों
जिंदगी रुक सी गयी है
ख़ामोशी की चादर में
छुप सी गयी है |

न जाने क्यों
मुस्कुराना छोड़ दिया
झूटी मुस्कान से अपने
आंसुओं को छुपाना सीख लिया |

न जाने क्यों
ख़ुशी में झूमना छोड़ दिया
दूसरों की ख़ुशी में
अपने गम को भुलाना छोड़ दिया |

न जाने क्यों
आज सबकुछ  पूरा
हो के  भी कुछ अधुरा सा है
खुशियों की दिवाली के बीच
एक अँधेरा सा है |