Tuesday, November 30, 2010

इस अंधी दौड़ में
इतनी तेज़ भागे की
याद नही कहाँ उतारे थे जूते ..

सपनो को अपना बनाने के फेर में
अपनों से इतने दूर चले आये की
याद नही कहाँ उतारे थे जूते..

अपना सर ऊँचा रखने क लिए
कितनो का सर कलम किया
किसी को अपना बनाने क लिए
कितनो को खुद से दूर किया

तितलियों को पकड़ने में
फूलों से इतने दूर चले आये की
याद नही कहाँ उतारे थे जूते..

दूसरों को खुश करने क लिए
खुद से इतने दूर चले आये की
याद नही कहाँ उतारे थे जूते..

Sunday, November 28, 2010

चुपचाप गुमसुम रहने लगा हूँ,
भीड़ में नहीं ,तन्हाई में जीने लगा हूँ,
रौशनी नहीं ,अँधेरे में रहने लगा हूँ ,
ख़ुशी नहीं ,दर्द को जले लगाने लगा हूँ,
जीत नहीं ,हार की भीख मांगने लगा हूँ,
खूबियाँ नहीं ,कमियाँ गिनने लगा हूँ,
लोगों नहीं,परछाई से डरने लगा हूँ ,
खुली हवा छोड़ ,घुटन में जिनने लगा हूँ ,
खुद से ही खुद का अंत करने लगा हूँ ...

Friday, November 19, 2010

सामने खड़ी थी वो,
आँखों में काजल के साथ थी वो,
गुलाबी रंग में गुलाब थी वो ,
बार-बार लटों  को पीछे सरकती वो,
दाँतों में ऊँगली दबाये शर्माती वो ,
नम-नम मुस्काती वो,
दाँतों में ऊँगली दबाये शर्माती वो,
कांपते होटों से कुछ कहना चाहती वो,
शायद अपने दिल की बात...
...कहना चाहती थी वो ....

Friday, November 5, 2010

याद आती है,
माँ की झलक के लिए मोटे-मोटे आंसूं बहाना,
पिताजी की मेहनती उँगलियों को थामे चलना,
मेले में खिलोने के लिए माँ के आँचल को खींचना ,
पिताजी की चूमती प्यारी मुछों से खेलना ..

याद आती है,
स्कूल के पहले दिन का वो रोना,
माँ को बार-बार पलट-पलट कर देखना,
बगल में बैठने वाले को भीगी आँखों से घूरना,
और घंटी बजने का इंतज़ार करना..

याद आती है ,
बारिश के मौसम में कागज की कश्ती का वो डोलना,
उन उछलते मेंढकों को तंग करना,
माँ की डांट  से  डरते हुए बारिश में भींगना,
भींग कर बीमार होने पर पिताजी का डांटना..

याद आती है,
वो पहली दाढ़ी को बार-बार निहारना,
वो माँ-पिताजी से पहली बार उलझना,
उदास होने पर माँ का वो समझना ,
डरते हुए पिताजी से माफ़ी माँगना..

याद आती है ,
क्लास में बगलवाली लड़की का हँसना,
बात करने के नए-नए मौके तलाशना,
उसकी मदद के लिए दौड़े चले आना,
दुसरे लड़के से बात करते देख वो जलना..

याद आती है ,
दोस्तों के साथ सीढियों पे मस्ती करना ,
एक के तिफ्फिन को बीस के साथ खाना,
एक-दुसरे को अजीब-अजीब  नामों से बुलाना,
पकडे जाने पर क्लास के बाहर खड़े रहना ..

याद आती है,
एक दुसरे के लिए लड़ने को तैयार रहना ,
क्लास के पिछले दरवाज़े से भागना ,
स्कूल की ऊँची दीवार को फांदना,
पार्क में जाकर हरी घांस पर घंटों लेटे रहना..

याद आती है इन्ही पलों की,
जब अकेले में धुंए का कश लेता हूँ,
जब कमरे में लेटे हुए नींद का इंतज़ार करता हूँ,
जब सुनसान राहों पर अकेले चलता हूँ,
जब खुद को तन्हा पाता हूँ.....