चुपचाप गुमसुम रहने लगा हूँ,
भीड़ में नहीं ,तन्हाई में जीने लगा हूँ,
रौशनी नहीं ,अँधेरे में रहने लगा हूँ ,
ख़ुशी नहीं ,दर्द को जले लगाने लगा हूँ,
जीत नहीं ,हार की भीख मांगने लगा हूँ,
खूबियाँ नहीं ,कमियाँ गिनने लगा हूँ,
लोगों नहीं,परछाई से डरने लगा हूँ ,
खुली हवा छोड़ ,घुटन में जिनने लगा हूँ ,
खुद से ही खुद का अंत करने लगा हूँ ...
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