क्यों सब पूरा हो के भी
कुछ अधुरा सा है
सब कुछ कह के भी
कुछ अनसुना सा है |
सपने पाले बैठे थे
सारा जहाँ अपना होगा
हमसे ज़माना होगा
ज़माने से हम नहीं |
दुनिया हमारी मुट्ठी में
खुशियाँ हमारे क़दमों पे
हम यहाँ के बादशाह
और सारी नज़रें हम पे |
न जाने कैसे सपनों को
किसकी नज़र लग गयी
समय की तेज़ रफ़्तार में
किस्मत हमसे रूठ गयी |
चाहा तो बहुत कुछ था
पर चाहने से क्या होता है
अपनी ही गलतियों से
अपनी किस्मत फूटी थी |
ज़माने को क्या पता
हम पे क्या बीतती है ...
फर्क बस इतना है ,
अपना गम भुलाने के लिए
वो हमपे हँस रहे हैं
और एक हम हैं
अपने आंसुओं को छोड़
दूसरों के आंसूं पोंछ रहे हैं ||
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