आज लौटना चाहता हूँ
उन पलों में ,
जहाँ हर एक सुबह
माँ की गोद में होती थी
डब डब करती आँखों को
पहली दर्शन माँ की होती थी |
आज लौटना चाहता हूँ
उन पलों में,
जहाँ पापा के गाड़ी की
कर्कश होर्न भी
सबसे प्यारी लगती थी |
आज लौटना चाहता हूँ
उन पलों में ,
जहाँ लड़खड़ाने पे भी
पापा का सहारा होता था
अँधेरी रातों के डर से
छुपने क लिए माँ का अंचल काफी होता था |
आज लौटना चाहता हूँ
उन पलों में,
जहाँ एक कहानी
या एक लडू ही
अपनी मांगे होती थी |
आज लौटना चाहता हूँ
उन पलों में
जिनकी कीमत आज
समझ पता हूँ ||
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