Thursday, July 7, 2011

आज लौटना चाहता हूँ
उन पलों में ,

जहाँ हर एक सुबह
माँ की गोद में होती थी 
डब डब करती आँखों को
पहली दर्शन माँ की होती थी |

आज लौटना चाहता हूँ
उन पलों में,

जहाँ पापा के गाड़ी की
कर्कश होर्न भी
सबसे प्यारी लगती थी |

आज लौटना चाहता हूँ
उन पलों में ,

जहाँ लड़खड़ाने पे भी
पापा का सहारा होता था
अँधेरी रातों के डर से
छुपने क लिए माँ का अंचल काफी होता था |

आज लौटना चाहता हूँ
उन पलों में,

जहाँ एक कहानी
या एक लडू ही
अपनी मांगे होती थी |

आज लौटना चाहता हूँ
उन पलों में
जिनकी कीमत आज
समझ पता हूँ ||

No comments:

Post a Comment