Tuesday, March 29, 2011

आज फिर उस दोराहे पे खड़ा हूँ
जहाँ से होकर कभी मैं गुजरा था 

ज़िन्दगी बार-बार
इस दोराहे पर क्यों ले आती है 
दोनों ही राहें 
कुछ खोने को मजबूर कर जाती हैं

चाह कर भी 
दोनों पर साथ नही चल सकता
पर एक पर चलने के लिए
खुद को मजबूर भी नहीं कर सकता

ज़िन्दगी क्यों मेरे साथ
ऐसा मजाक कर जाती है 
ऐसे दो राहों पर बार-बार
मुझे क्यों ले आती हैं..... 

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