Monday, March 7, 2011

अनजाना सा रिश्ता बन गया है तुमसे
दूर होकर भी पास हो मुझसे,
आँखें बंद करने पर 
तुम ही नज़र आती हो ,
आँखें खोलता हूँ
न जाने कहाँ खो जाती हो ,
दूरियों के बीच 
ये दिल तुमसे मिलने को मचलता है ,
पर इन दूरियों के बीच ही कहीं 
तुम्हे सुन  कर ही कुछ चैन मिलता है ,
अब तो तुम्हारी यादें ही 
मेरे होटों पे मुस्कान बिखेरती है ,
अब तो तुम्हारी बातें ही 
उदासी की धूप में छाँव देती हैं,
न जाने क्यों 
मैं यह सब लिख रहा हूँ ,
आज न जाने क्यों 
मैं अपने दिल की बात सुन रहा हूँ ....

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